namaste-mandala

इस दुनियाँ में कोई नास्तिक नहीं , सब आनन्द पाना चाहते हैं और वेद उपनिषद् आनंद को ही परमात्मा कहते हैं ।
मनुष्य के जीवन में सुख दुःख अस्थायी हैं, आने जाने वाले हैं । हर सुख के पीछे दुःख खड़ा है और अंत में मनुष्य बिना परमानंद में अवस्थित हुए विदीर्ण हो मृत्यु को प्राप्त हो जाता है जबकि मनुष्य की चाहत कभी न समाप्त होने वाले आनंद की थी - चिर स्थायी आनंद चाहिए था ।
यदि हमारी चाहत चिर स्थायी आनंद की है तो हमारे लक्ष्य भगवान श्री राधाकृष्ण एवं उनके शब्द विग्रह श्रीमद्भागवत महापुराण ही होने चाहिए ।
जिस वस्तु का स्रोत जहाँ होगा उसकी उपलब्धता भी वही होगी जैसे साड़ी कपड़े की दुकान में ही मिलेगी , बर्तन बर्तन की दुकान पर , सोना सुनार के पास - उसी प्रकार यदि हम अनंत सुख, अनंत आनंद , अनंत प्रेम चाहते है तो वो भी अनंत के पास ही मिलेगा ।आनन्दकन्द नंदनंदन श्री कृष्ण जिनका सब कुछ मधुर है (अधरम मधुरं वदनं मधुरं)और प्रेममयी रसमयी कृपामयी श्री राधा की दयालुता और करुणा की धारा के जो स्रोत हैं उन राधा कृष्ण के चरणारविन्द में प्रेम मय समर्पण से ही हम चिरस्थायी आनंद के भागी बन सकते हैं ।
क्षणभंगुर संसार का सुख दुख भी क्षणभंगुर ही होगा।यदि हम अनंत अखंड आनंद की प्राप्ति चाहते हैं तो अनंत अखंड परम् सत्ता के शरण में जाना ही होगा। इसके लिए -
सनातन धर्म में समय के अंतराल में आ गयी रूढ़िवादिता को आत्यंतिक रूप से अलग कर इसके मूल तत्व को जन सामान्य के समक्ष प्रकाशित करना इस साइट का उद्देश्य है जिसके लिए सर्वप्रथम श्रीआनंदमधाम वृन्दावन की स्थापना की गयी ।
पूज्य गुरुदेव का निर्देश अनुपालन करते हुए विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में स्थानीय श्री आनंदमधाम की इकाइयाँ अस्तित्व में आईं और बड़ी संख्या में लोग इनसे जुड़ कर उस विधा में अग्रसर हो रहे हैं जिसका लक्ष्य चिरस्थायी आनंद की प्राप्ति है ।
श्रीमद्भागवत महापुराण में छुपे रहस्यों को तथा भागवत के मन्त्रों के उपयोग से मनुष्य के स्वास्थ्य पर होने वाले दिव्य प्रभाव को जन हित में जगत के सामने रखने हेतु भागवत शोध संस्थान की स्थापना की गयी है ।
उद्देश्य एक मात्र है कि हमें चिर- स्थायी परमानंद कैसे उपलब्ध हो - हम कैसे भगवान श्री राधाकृष्ण के चारणानुरागी बनें ।

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