Towards Blissful life

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इस दुनियाँ में कोई नास्तिक नहीं , सब आनन्द पाना चाहते हैं और वेद उपनिषद् आनंद को ही परमात्मा कहते हैं ।
मनुष्य के जीवन में सुख दुःख अस्थायी हैं, आने जाने वाले हैं । हर सुख के पीछे दुःख खड़ा है और अंत में मनुष्य बिना परमानंद में अवस्थित हुए विदीर्ण हो मृत्यु को प्राप्त हो जाता है जबकि मनुष्य की चाहत कभी न समाप्त होने वाले आनंद की थी - चिर स्थायी आनंद चाहिए था ।

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हम धार्मिक हैं , संस्कारी हैं , धनवान भी हैं पर आनंदित नहीं हैं और जो धार्मिक , संस्कारी , धनवान हो वह आनंदित न हो ऐसा हो ही नहीं सकता । तो हमें फिर से विचार करना होगा कि जिसे हम धर्म , संस्कार और धन समझ रहे हैं - कहीं हमारी समझ में कोई भूल तो नहीं है और हम मूल धर्म , संस्कार और धन से वंचित तो नहीं हो रहे हैं ।
( मेरी समझ में आनंद ही श्रीकृष्ण है और श्रीकृष्ण ही आनंद है )

- सद्गुरु भगवान -
श्री श्री रितेश्वर जी

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ।।
कर्ता करे न कर सके गुरु किये सो होय ।
सात द्वीप नव खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय ।।
सारे तीरथ धाम आपके चरणों में ।
हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणों में ।। - (2)
हृदय में माता गौरी लक्ष्मी
कंठ शारदा माता हैं -(2)

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About Guruji

ब्रह्मनिष्ठ पूज्य गुरुदेव श्री श्री रितेश्वर जी दासानुदास बाल्यकाल से ही अद्भुत आध्यात्मिक प्रतिभा संपन्न रहे । सनातन धर्म के प्रति उनका लगाव व् समर्पण अतुलनीय है ।
गुरुदेव ने विधिवत विज्ञान के हर क्षेत्र की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत मेडिकल की डिग्री प्राप्त की । इन सब के दौरान उनकी आध्यात्मिक साधना साथ साथ चलाती रही ।

जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंन्द अनुभव करेगा।

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