स्वान्तः सुखाय -शब्द की महिमा

Guruvani

स्वान्तः सुखाय रघुनाथ गाथाय – तुलसी दास की सबसे श्रेष्ठ स्वीकारोक्ति और अभव्यक्ति – इस राम कथा को लिखने के लिए तुलसी दास जब बैठे हैं तो इनके मन में किसी प्रकार की समाज सेवा , किसी प्रकार के प्रचार और प्रसार की भावना भीतर में नहीं है इसलिए उन्होंने लिखा कि यह जो राम चरित्र मानस मैं लिख रहा हूँ वह स्वान्तः सुखाय है – अपने सेल्फ के लिए , आपने सुख के लिए ।
कोई इससे दुखी भी होता है तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता औरकोई इसे पढ़ कर अपने दुखों से मुक्त हो जाता है तब भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनकी बुनियाद अपने लिए है । उन्होंने इस ग्रंथके रचना की जो नींव डाली वह न व्यक्तियों के निर्माण के लिए, न परमात्मा की प्रसन्नता के लिए , न समाज सुधार के लिए – उनके भीतर यह सब कोई भी रोग नहीं है । बड़े स्पष्टवादी हैं तुलसीदास जिन्होंने यह स्वीकार किया कि मैं यह राम के लिए भी नहीं लिख रहा हूँ कि राम मुझसे प्रसन्न हो जाँय , मैं उन भक्तों के लिए भी नहीं लिख रहा हूँ जो पढ़ कर प्रसन्न हों और उन लोगों के लिए भी नहीं लिख रहा हूँ जिसे पढ़ कर वे लोग भक्त बन जाँय – मेरा ऐसा कोई विचार है ही नहीं । इस रामचरित्र मानस की गाथा लिखने से मुझे सुख मिल रहा है , मैं आनन्दित हूँ , मैं ब्लिसफुल हूँ
इसलिए मैं इसको लिख रहा हूँ इसलिए तुलसी दास को दुखी करने का दुनियाँ में कोई उपाय नहीं । यह महात्मा या व्यक्ति बड़ा चतुर है इसलिए वर्षों के लिखे हुए इस ग्रंथ को चारों तरफ इतनी प्रशंसा – इतनी स्वीकारोक्ति मिल रही है ।
एक देश का नाम तुमने सुना होगा – फ़िजी , भारत से बहुत मिलता जुलता है । उस फ़िजी का निर्माण कैसे हुआ – तुम भी जानते होंगे । उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ व्यक्तियों को एक बोट पर , स्टीमर पर – गाँव के सीधे सादे लोगों को यह कह कर बुलाया गया कि तुम कलकत्ते चलो – वहाँ दर्शन भी करेंगे और तुम्हारे लिए बड़ी उत्तम व्यवस्था है , नौकरी करना चाहो तो बड़ा सुन्दर , बड़ी पगार की नौकरी भी मिलेगी तुम्हें ।
कुछ लोगों ने ऐसे बोट लगाए और हजार डेढ़ हजार के करीब भोले भाले गरीब लोग बैठे इस गंगा जी में और वह होता हुआ कलकत्ते तो न गया , जिसको तुम फ़िजी जानते हो वहां पहुँचा और वहाँ टापू पर जाकर उतार दिया इनको और जो ले आए थे वे भाग गए – चले गए ।
अब इनके पास कोई आधार नहीं था , कोई अवलम्बन नहीं था – ये खाएँ क्या, जीएँ कैसे , रहें कैसे – टापू पर खेती भी अच्छे से नहीं दिखाई देती थी और तब इन्होंने स्वयं मजदूर बनना स्वीकार किया, खेत बनाए , गन्ने की खेती की और धीरे धीरे वहीं के बाशिंदे हो गए ।
आते समय यू पी और बिहार के लोग ये – राम चरित्र मानस के ऊपर इनकी बड़ी श्रद्धा थी , बैग में झोले में – सब के साथ राम चरित्र मानस गए थे
और ये जब लंबी यात्रा पर जाते हैं तो व्यवस्थाएं भी करके जाते हैं – ढोलक , हारमोनियम , करताल , झाँझ – गाते , कीर्तन करते ये जाएँगे । जब उनके पास जीने का कोई वहां तरीका न था , मरना ही था तो इन्होंने परिश्रम करना शुरू किया और धीरे धीरे उस द्वीप को हरा-भरा कर दिया और ये रात्रि में बैठ कर , शाम को बैठ कर – राम चरित्र मानस निकाल कर खूब कीर्तन करते और उनकी कथा करते – वे मजदूर ही थे , जो समझ आता एक दूसरे को बताते ।
मण्डलियाँ बन गईं – धीरे धीरे इन्ही लोगों में विवाह हुआ, संतान – संतति उत्पन्न हुयीं और एक देश बन गया – फ़िजी जहाँ आज रामायण ही उस देश की संस्कृति है -तुम जानते हो ।
तुलसी दास के मन में ऐसा कोई विचार न होगा कि ऐसा होगा और एक ऐसे कंट्री में जिसका मूल संविधान ही रामायण के अनुसार चलेगा – उन्होंने ऐसा सोचा न होगा , न यह सोच कर उन्होंने लिखा होगा क्योंकि उन्होंने पहले ही लाइन में लिख दिया -‘स्वान्तः सुखाय’ । अगर कोई गलतफहमी में हो तो मत रहना की मुझे बाबा जी बनने का शौक है , मुझे महात्मा कहलाने का शौक है, जीवन में मेरी पूजा हो , लोग मेरी जय जय कार करें – बिलकुल ही इससे अपनेआप को अलग कर लिया और ‘स्वान्तः सुखाय’ सिर्फ अपने सुख के लिए अपनी मस्ती के लिए ।
तुलसी दास का यह कदम दुनिया के किसी भी श्रेष्ठ व्यक्ति के कदम से श्रेष्ठ हो सकता है ।
………….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Rating*