सुन्दर काण्ड का मर्म

Guruvani

हरि का कार्य हमारे शोक , रोग , दुःख और ताप का और हमारे दुर्गुणों का हरण करना है इसलिए उन्हें हरि कहा जाता है । और आज हनुमान जी जो एक साधक के रूप में हैं , जिन्हें जीवन में शान्ति की खोज है और अपने बल को भूले हुए हैं – सद्गुरु जामवंत के द्वारा उन्हें उनके बल की याद दिलायी जाती है , स्मरण कराया जाता है । उन्हें स्मरण होता है इसका और फिर अपने गुरु वचनों को सुन कर “जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ।।”
गुरु कहते श्रेष्ठ ही हैं पर जीवन के कार्य सफल कब होते हैं – जब हनुमान जी की तरह उनके वचन आपके हृदय को भा जाँय – “सुनि हनुमंत हृदय अति भाए” ।
हनुमान जी के पास ऑप्शन था – बाकी बंदरों की तरह रिजेक्ट कर देते कि मैं तकलीफ में हूँ , नहीं जा सकता पर गुरुवचनों पर दृढ विश्वास है उनको और गुरु की वाणी सुन कर उनके हृदय में हर्ष होता है। यह कोई हर्ष का विषय नहीं है क्योंकि लंका की यात्रा बड़ी कठिन है , बहुत तकलीफें हैं – जिसे हम कहते हैं – तन मन धन तीनों को जागतिक रूप से देखें तो हानि ही हानि लगती है पर हनुमान जी स्वीकार करते हैं क्योंकि गुरुवचन है – गुरुगंभीर वचन है – और मेरा
इसमें कोई नुकसान नहीं हो सकता और वह आगे बढ़े और रास्ते में हनुमान जी के चलते समय – आपको याद है – उनके मन में हर्ष है मानो हनुमान जी यह सन्देश दे रहे हैं कि धर्म के पथ पर चलने से पहले कई लोग उदास हो जाते हैं – साधन करना है , भजन करना है , पूजा करना है , बड़ी उदासी का माहौल है दुनियाँ में – जैसे कोई मजबूरी की बात हो , कोई विष पीना हो – निभाए चले जा रहे हैं – हनुमान जी यह सन्देश दे रहे हैं कि अगर उदास होकर हरि काम में लगोगे- गुरु के वचन सुनने के बाद भी अगर हृदय में उदासी रहती है तो सुखी तो हो सकते हो पर शांत नहीं हो सकते ।
भगवान राम कौन हैं ? भगवान राम सुख की खान हैं : “भज मन राम चरन सुखदायी” – सुखों की खान हैं । अब जरा समझिए कि राम और सीता एक दूसरे के बिना अधूरे कैसे हैं – राधा और श्याम एक दूसरे के बिना अधूरे कैसे हैं ।
इसका सीधा अर्थ यही है कि एक सुख पुँज है और एक शान्ति कुञ्ज है ।
इस दुनियाँ में सुखी लोग तो बहुत हैं पर शांत नहीं हैं और सुन्दर काण्ड की यात्रा सुखी व्यक्ति की शान्ति की ओर की यात्रा है ।
सुख से शांति की ओर जो यात्रा है वही सुन्दर काण्ड है ।

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