सत्संग 05.09.16 भाग 6

Events Guruvani

आदि शंकराचार्य के दादागुरु श्री गौड़पादाचार्य जंगल में बैठते हैं कुटिया में और बैठ कर भजन करते हैं प्रिया प्रियतम का और दिन भर में चार बार प्रिया जी और चार बार प्रियतम जी जाते हैं पूछने के लिए कि बाबा कोई कष्ट तो नहीं है भजन में – ठाकुर और ठकुरानी जाते हैं – बाबा कोई कष्ट तो नहीं है — ‘नहीं नहीं , कोई कष्ट नहीं है’ – और फिर एक दिन जब किशोरी जी आकार पूछीं – बाबा कोई कष्ट तो नायँ तो शंकराचार्य के दादागुरु कहते हैं कि हे किशोरी जी ! हमारा एक प्रश्न है । किशोरी जी बोलीं – बताओ – बाबा बोले – जरा श्यामसुंदर से पूछना कि मेरा सौभाग्योदय कब होगा ? प्रिया जी बोलीं – अरे बाबा ! तेरी बुद्धि खराब हो गयी है तो , अरे ! बड़े बड़े जोगी , तपी, ज्ञानी,बड़े बड़े याज्ञीक , अनुष्ठानिक ,अपूर्वसंभावित अनंत अनंत भगवत संबंधी अनुष्ठानों को करने वालों को भी हमारे नख चंद्रिका की एक किरण का भी दर्शन नहीं होता और तुम्हें चार बार हम पूछने आते हैं चार बार श्याम सुंदर पूछने आते हैं उसके बाद भी तुम पूछते हो कि तुम्हारा सौभाग्योदय कब होगा ? प्रिया और प्रियतम तुम्हारी साधना के सम्बन्ध में आते हैं पूछने , दर्शन देने , तुम्हारी सेवा करने – अरे जिनके नख का दर्शन करने के लिए ब्रह्मा को साठ हजार
वर्षों तक तपस्या करनी पड़ी
फिर भी उस राधा के नख चंद्र मणि की छटा का दर्शन ब्रह्मा न कर पाया उन राधाकृष्ण के अनंत अनंत बार तुम्हारे पास आने के उपरांत तुम यह प्रश्न करते हो , हमसे यह प्रश्न पूछते हो कि हमारा सौभाग्योदय कब होगा ? उसी समय गौड़पादाचार्य की आँखों से अजस्र अश्रु झर झर बहने लगे । प्रिया जी बोलीं – आरोप तो लगा दिया श्यामसुंदर पर और मुझपर – अब क्यों रोते हो ? आदि शंकराचार्य के दादागुरु गौड़पादाचार्य कहते हैं – हे प्रिया जी ! अरे , जब चार घंटे
के लिए चार बार तुम आती हो चार बार श्यामसुंदर आते हैं – जब तुम आती हो तो श्यामसुंदर तुम्हारे विरह में तड़पते हैं और जब श्यामसुंदर मेरे पास आते हैं तो तुम विरहाकुल हो कर रहती हो , मैं यही पूछ रहा हूँ कि हम तुमको विरह देने के लिए नहीं आए हैं बल्कि मैं तो ऐसा सौभाग्य चाहता हूँ की मैं
यहाँ बैठ कर प्रिया और प्रियतम का नाम लेता रहूँ , आँखों से अश्रु गिराता रहूँ और तुम प्रिया प्रियतम वृन्दावन में आनंद की सेज पर आनंद के झूले पर झूलते रहो – उन विराहानंद के अश्रुजल मुझे कब मिलेंगे – मेरा सौभाग्योदय कब होगा ? मैं इसके बारे में पूछता हूँ ।
अरे रे रे – प्रिया जी की आँखों में आँसू आ गए – इतना बड़ा संत – मिलन को भी आनंद नहीं मानता , यह विरह को आनंद मानता है ।
श्रीकृष्ण के रस सिद्धांत से जिन्होंने परिचय प्राप्त किया है , श्री वृन्दावन के रसिक संतों के मिजाज को जिन्होंने समझा है , वृन्दावन की रस उपासना और रस सिद्धांत के सार तत्त्वको जिन्होंने आत्मसात किया है उनको यह पता है कि राधा और कृष्ण से मिलन में वह मस्ती नहीं है जो राधाकृष्ण के विरह में आँखों से अश्रुजल बहाने में है ।

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