सत्संग 05.09.16 भाग 5

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व्रज वृन्दावन की सबसे बड़ी साधना है श्रीराधाकृष्ण का विरह । अगर तुम्हारे हृदय में प्रिया और प्रियतम का विरह न आया , कृष्ण विरह न हुआ तुम्हारे हृदय में ,श्री प्रिया जी के विरह से तुम विरहाक्रान्त न हुए , श्री प्रिया जी के अजस्र अश्रु धारा को देखते हुए तुम्हारे अश्रु बूँद भी न आई तो श्री कृष्ण तुम्हारे लिए साध्य नहीं हैं , श्री राधा तुम्हारे लिए साध्य नहीं हैं – तुम और कोई रास्ता देखो क्योंकि जिनके नेत्रों में अश्रु बिंदु नहीं , जिनके हृदय में कोई भावना नहीं , जिनके हृदय में कृष्ण से विरह के उपरान्त कोई रुदन नहीं – श्री कृष्ण और श्री प्रिया जी उनके किसी काम के नहीं ।
वृन्दावन के रसिक संत कोई मूर्ख न थे , कोई अज्ञानी न थे
– वेद वेदान्त सिद्धांत सब को घोल कर पी लिया था उन लोगों नें , इस संसार में सनातन परंपरा के कोई ग्रन्थ नहीं , कोई क्रिया नहीं जिसको घोल कर न पीया हो लेकिन उनके बाद भी इन सब का कोई प्रयोग नहीं । ‘अलम्ब विषय वार्तया’ अरे रे इस संसार की बातों को छोड़ो – कहा क्यों ? कहा यह नरक की तरह हैं ‘नरक कोटि विभत्सया’ , ‘अलम्ब विषय वार्तया नरक कोटि विभत्सया’ -क्या करें ? कहा – मनुष्य के रूप में आकर , व्रज में आकर तुम अभी भी तर्क-वितर्क , अभी भी तुम सांख्य , अभी भी तुम योग , अभी भी तुम तपस्या , अभी भी तुम पूजा , अभी भी तुम व्रत , अभी भी तुम उपवास – इन सब तुच्छ साधनों में अटके हुए हो – इन सब साधनों में क्या हैसियत जो श्री कृष्ण श्री राधा के चरण रज का भी दर्शन तुम्हें करवा सकें ।यह अनन्त साधनाएं मिल कर भी श्रीकृष्ण के चरण के रज का भी दर्शन नहीं करा सकतीं , श्री कृष्ण तो दूर की वस्तु हैं , श्री प्रिया जी तो दूर की वस्तु हैं ।
श्रीकृष्ण और श्री प्रिया जू को उपलब्ध होने के लिए , उनके नित्य लीला में प्रवेश मात्र के लिए जीव की कोई पात्रता नहीं है और पात्रता से कोई प्रिया प्रियतम की लीला में प्रवेश पा भी नहीं सकता – बड़े बड़े सन्यासी , बड़े बड़े योगी , जपी, तपी , यती ,पौराणिक , अपूर्व संभावी अनन्त अनुष्ठान करने वाले लोग भी भगवान प्रिया प्रियतम के प्रेम क्षेत्र के दरवाजे तक नहीं पहुँच पाते – दर्शन की तो बात छोड़ो।
यहाँ तो पात्रता बस एक मात्र है – यहाँ की पात्रता है – भक्ति, दीनता , हृदय में विरह और आँखों में आँसू ।
श्री मीरा जी कहती हैं – ‘अगर मैं जानती कि प्रीत किये दुःख होय तो नगर ढिंढोरा पीटती कि प्रीत न करियो कोय’ – ज़रा सोचो तो उस वेदना के विषय में , उस तड़प के विषय में – पर एक बात तुम्हें मैं कह दूँ कि यह दर्द भी बड़ा हसीन है , यह दर्द भी बड़ा मीठा है , यह ज़माने का दर्द नहीं है यह प्रिया प्रियतम के न मिल पाने के कारण उत्पन्न हुई विरह की ज्वाला के कारण जो दर्द उत्पन्न होता है वह दर्द संसार के किसी चरम और परम आनंद से कोटि गुना अधिक आनन्द दायक होता है । यहाँ दर्द भी आनंद देता है और मीरा जी कह तो रही हैं दूसरों को कि मैं नगर ढिंढोरा पीटती कि प्रीत न करियो कोय – पर क्या खुद छोड़ पाती हैं क्या ? क्या श्रीकृष्ण के प्रेम के विरह की जो उन्माद की ,जो आनंद की, जो चरम परम समाधि अवस्था है उस अवस्था का त्याग मीरा जी कर पाती हैं क्या ?
इसलिए श्रीकृष्ण और प्रिया जी के लिए रुदन भी उतना प्यारा है ,जगत के लिए हँसना भी उतना प्यारा नहीं हो सकता, जगत की हँसी भी कृष्ण और राधा के रुदन से अनंत गुना निम्न कोटि की है
इसलिए रसिक संतों ने सदा नेत्रों में अश्रुजल लेकर प्रिया प्रियतम के विरह के दर्द में आनंद लिया है , यह विराहानंद है । लोग समझते हैं विरह का अर्थ दुःख होता है , जगत से विरह हो , जगत के किसी रिश्ते नाते से विछोह हो तो वह दुखद होता है पर प्रिया और प्रियतम का विरह भी आनंद स्वरुप होता है – विराहानंद -और जितने भी वृन्दावन में संत हुए उन्होंने मिलनानंद नहीं लिया विरहानंद ही लिया ।

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