सत्संग 05.09.16 भाग 4

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गोपियों को देखो , उनके रुदन को देखो , उनके विरह को देखो – वे तो पराकाष्ठा हैं कृष्ण प्रेम की ।
श्री राधा बैठी हैं और उद्धव आते हैं तो राधा की विरहावस्था देखकर उद्धव का ज्ञान तार तार होता है – उनके चरणों में गिर पड़ते हैं – हे माँ ! माता कहते हैं – माता!
कृष्ण परमात्मा है मैं यह न जानता था पर आज आपके दर्शन कर के मुझे यह विश्वास हो गया कि जिनके लिए आप विरह में हो , आपकी इस दिव्यावस्था को देख कर, आपकी इस परमावस्था को देख कर मुझे यह विश्वास हो गया कि कृष्ण ही परमात्मा हैं।
जगत जननी जिनके लिए इतने विरह में हैं , इतनी तड़प में हैं -उस समय का वर्णन क्या करें – कोमल कमल के पत्तों पर जब राधारानी को सुलाया जाता है तो राधारानी के विरह के ताप से वे पत्ते मुरझा जाते हैं -तत्क्षण – श्री राधा के स्पर्श मात्र से कमल मुरझा जाता है । जब प्रेम की अवस्था और मिलन की अवस्था होती थी तो कलियाँ छू लेने से वे फूल बन जाती थीं – श्री राधा जब छू लेती थीं किसी कली को तो वह तत्क्षण फूल बन जाते – खिल जाते और जब विरहोन्मादिनी
श्री राधा विरह के उन्माद में जब क्रन्दन करती थीं उनके शरीर से ताप निकलने लगते विरह के , श्री राधा के शरीर को जो स्पर्श कर लेता मानो धू धू कर जल उठता, सखियाँ भी उनके शरीर के ताप को सह न पातीं – कोमल कोमल -सब कोमल पर जैसे ही श्री राधा का स्पर्श होता वे सब जल जातीं – प्रेम में इतना ताप है , विरह में इतना ताप है ।
तपस्या किसे कहते हैं ?
हम बड़ी बड़ी बातें करते हैं – हम न खाएंगे , हम न पीयेंगे ,
हम दूध लेके रहेंगे , हम फल लेके रहेंगे , हम यह न खाएंगे , हम एक पैर पर खड़े रहेंगे – यह तपस्या थोड़े ही है – यह तो क्रिया मात्र है ,जड़ता है यह।
गोपियों और श्री राधा के जीवन में ऐसी कोई बात नहीं , कोई हठ योग नहीं है उनका , गोपी और श्री राधा के जीवन में बस कृष्ण का प्रेम ही मूल है । कृष्ण से मिलन भी हर पल है कृष्ण से विरह भी हर पल है ।
विप्रलम्भ – ब्रज की भाषा में ब्रज के साहित्य में विप्रलम्भ की बड़ी चर्चा की गयी है । विप्रलम्भ का अर्थ होता है –
राधा और कृष्ण एक ही झूले में झूल रहे हैं – प्रिया और प्रियतम – पर अचानक श्री राधा करुण क्रन्दन करनें लगती हैं – हा श्यामसुंदर हा कृष्ण- मोते कहा अपराध भयो प्यारे , कहाँ छोड़ गए – और फिर कृष्ण उनको पकड़ कर कहते हैं – मैं यहीं हूँ प्रिया , पर कृष्ण की उपस्थिति में भी कृष्ण के विरह का आस्वादन जब श्री राधा करने लगती हैं उनके नेत्रों से अजस्र अश्रुधार बहने लगते हैं ।
अनन्त गोपियाँ -परिचारिकाएं उनको सेवा देने लगती हैं पर श्री राधा का रुदन और विरह कम नहीं होता और फिर जैसे ही श्री राधा थोड़े थोड़े अपने होश में आने लगती हैं – अपनी पूर्व स्थिति में आने लगती हैं कि अचानक श्रीकृष्ण को विप्रलम्भ होता है – हा प्रिया -कहा अपराध भयो प्रिया – कहकर श्रीकृष्ण रुदन प्रारम्भ करते हैं – कहते हैं व्रज वृन्दावन में चौबीस घंटे सखियाँ कभी श्रीकृष्ण को चुप कराती हैं कभी श्री राधा को चुप कराती हैं ।
उनके इस रुदन का , उनके इस विरह का आस्वादन करने के लिए बड़े बड़े दिकपाल , देव, गन्धर्व,, नाग, पुंसवन, सुर, असुर, देवी, देवता – कोई वृक्ष बन कर कोई तोता बन कर कोई हिरन बन कर – अरे ! जिनको मौक़ा न मिला वह रज बन कर , रज कण बन कर -क्योंकि अनंत अनंत देवी देवता ,ऋषि ,प्रेमी, विरही , परिचारिकाएं , अनंत अनंत सेवक – सबकी इच्छा है कि भगवान श्रीराधाकृष्ण के इस प्रेमा विरह लीला का दर्शन करें तो जब किसी पशु और पक्षी में उनको जगह न मिली तो वे ब्रज के रज बन के वहाँ बैठे हैं धूल बनकर पड़े हैं कि प्रिया और प्रियतम के विरह का आस्वादन तो कर लूं ।

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