सत्संग 05.09.16 भाग 2

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भगवान श्रीकृष्ण की लीला हमें समझाती क्या है ?
धराधाम पर आकर ठाकुर जो बाल्य अवस्था में लीला कर रहे हैं वह सिर्फ यही समझा रहे हैं कि कुछ न दो तुम उनको , कुछ भी तुम्हारा सामर्थ्य नहीं पर भाव है , भाववश होकर स्मरण करो , उनका चिंतन करो – मत सोचो कि द्वापर चला गया , मत सोचो कि ठाकुर चले गए – ठाकुर नित्य लीला में विराजित रहते हैं । वह समयावधिक लीला होती है जब ठाकुर आते हैं , एक सौ पच्चीस वर्ष रहते हैं और लीला करके पुनः गोलोकधाम चले जाते हैं पर उनके विषय में क्या कहोगे – व्रज में जिन साधुओं को किशोरी जी आज भी पायस पिवा कर चली जाती हैं , ठाकुर जिनके द्वार पर खड़े हो जाते हैं , ठाकुर जिनके बोझ उठा कर चलते हैं – वहाँ गुजरात के उस भक्त नरसी मेहता के बारे में क्या कहोगे जहां छप्पन बार ठाकुर आकार इसी कलिकाल में नरसी मेहता की सहायता करते हैं – जहॉं उनकी प्रतिष्ठा जा रही होती है वहां ठाकुर खड़े हो जाते हैं , सारा समाज सारा गाँव नरसी मेहता का विरोधी है , सब उनकी दरिद्री के ऊपर उनकी हँसी उड़ाते हैं , अपनी जो जाति के लोग हैं वे तो कोई भी ऐसा अवसर न चूकते थे जिससे उनके हृदय को पीड़ा दी जा सके पर नरसी मेहता हर समय भाव मग्न रहते हैं , दोनों हाथ उठा कर हर समय द्वारिकाधीश के – ठाकुर के गुणगान में अपने समय को व्यतीत करते हैं और जब जब उन्हें जरूरत पड़ी – उन्होंने कभी पुकारा नहीं , छप्पन बार आए श्रीकृष्ण उनके लिए सशरीर लेकिन एक बार भी उन्होंने पुकारा नहीं ,बुलाया नहीं – बस जब समाज और लोगों की प्रताड़नाएँ सीमा के पार चली जाती थीं और नरसी की आँखों में आँसू रहता था , एक धोती पहन कर करताल लेकर कीर्तन करते रहते थे, उनके घर के जो सदस्य थे वह भी परेशान थे और कहते थे – इन्हें उन्माद हो गया है , पागल हो गए हैं – रोते थे -कि आप अच्छे भले थे , आपका नाम था , आपका व्यवसाय था , आप यह क्या कर रहे हैं पर नरसी किसी को जवाब नहीं देते , बस आँखों में सदैव अश्रु रहता था और भक्त की यह पहचान है जिसकी आँखें गीली न हों वह कृष्ण के किसी काम का नहीं, जिसकी आँखों में गीलापन न हो जिसका हृदय भाव की तरंगों में डूबता उतराता न हो जिसका मन कलियुग छोड़ द्वापर त्रेता और सतयुग की ठाकुर की इन लीलाओं में डूबता न हो वास्तव में ठाकुर उनके लिए अप्राप्य ही हैं । इसलिए मैं कहता हूँ कभी कभी – रोते सब हैं पर जो ठाकुर के लिए रोते हैं उनका रोना भी उपासना बन जाता है , जो ठाकुर के प्रेम में बिरही होकर और विराहोंमाद में नाचते गाते उछलते रोते हुए चिल्लाते हैं उनके भाग्य की सराहना कौन कर सकता है ?

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