सत्संग 05.09.16 भाग 1

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जब स्मरण होता है तो आँखों में आँसू आ जाते हैं । ठाकुर ब्रह्माण्ड के मालिक हैं और ब्रज में गोपियों के खट्टी छाछ के लिए अपमान सहते हैं , दौड़ते चलते हैं । कई बार गोपियों ने पकड़ कर पिटाई भी कर दी , ठाकुर को कई बार बाँध कर रख लिया ।
भाववश ठाकुर जिन जिन के मन में उनके प्रति भाव था उन सबके द्वार पर ठाकुर जाते हैं और माखन छाछ दही दूध जो होता है सब चुराते हैं ।
वास्तव में परमात्मा केवल भाव के भूखे हैं ।
कोई जप तप योग साधना नियम व्रत संयम न आता हो कोई बात नहीं पर भाव है तुम्हारे भीतर तो बार – बार भागवत कहती है “भाव ग्राही जनार्दनः” – ठाकुर भावग्राही हैं ।
इस दुनियाँ में धन दौलत बुद्धि सबके पास अलग अलग हो सकते हैं , शरीर सामर्थ्य सबके अलग अलग हो सकते हैं पर ठाकुर ने भाव देने में कोई भेदभाव न किया , मन देनें में कोई भेदभाव न किया ।
इसलिए भगवान श्रीकृष्ण की लीला हमें समझाती क्या है ?
धराधाम पर आकर ठाकुर जो बाल्य अवस्था में लीला कर रहे हैं यही समझा रहे हैं –
कुछ न दो तुम उनको , कुछ भी तुम्हारा सामर्थ्य नहीं पर भाववश होकर स्मरण करो उनका चिंतन करो उनका ….

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