‘सत्य’ : शब्दों से परे है

Guruvani

दुःख तो वहीं से प्रारम्भ होता है जब हम कोई भी कार्य लोगों के लिए करते हैं और जब लोगों के लिए करते हैं तो अपेक्षाएँ जोड़ लेते हैं । अपेक्षा पूर्ण न हो तो क्रोध और अपेक्षाएँ पूर्ण हों तो लोभ । गीता यही तो कहती है कि कामना है और पूरी हो गयी तो लोभी बन जाओगे और जो कामना तुमने की है अगर न पूर्ण हुई तो क्रोधी बन जाओगे , क्रोध उत्पन्न हो जायगा ।
कोई कहता है क्रोध मत करो , कोई कहता है लोभ मत करो पर कोई भी नहीं बताता कि यह पॉसिबल कैसे हो ? यह संभव कैसे हो ?
शब्दों में इतनी ताकत नहीं है कि तुम्हारे कह देने से मैं मान लूँ । राम ने इतनी बातें कहीं , मैं मानने को तैयार नहीं, कृष्ण गीता कह कर चले गये , कोई मानने को तैयार नहीं । तुम राम और कृष्ण से अपने आपको श्रेष्ठ समझ कर अगर आए हो तो मुझे कोई तकलीफ नहीं , दुःख नहीं – तुम हो भी सकते हो अगर तुम ऐसा सोचते हो , पर ज़रा सोचो इनके लिविंग रहते न उनके प्रवचनों का कोई असर
अयोध्या वासियों पर पड़ता है न द्वारिका के वासियों पर पड़ता है – कोई उनकी बातों को नहीं सुनता ।
इसलिए तुलसीदास ने देखा कि मैं जिनकी कथा लिखने जा रहा हूँ ये एक ऐसी पर्सनालिटी हैं जिनकी बात कोई नहीं सुनता – याद में तो बड़े मजेदार हैं – ये पर्सनालिटी तो हमारे भीतर में अनन्त सुखों को उत्पन्न करने वाली है , ये पर्सनालिटी तो मुझे मेरे आनन्द तक पहुँचा देगी पर जब ये स्वयं लिविंग थे उनकी कोई बात नहीं सुनता । इसलिए तुलसी दास के इष्ट हैं राम – वो हवा हवाई नहीं हैं । ऐसे किसी के कहने से नहीं सुन लिया , धार्मिक बनने का ख़याल न आया होगा मन में । तुलसी दास को जीवन में एक ही चिंता थी कि मेरा उद्धार कैसे होगा और आज मैं तुम्हे वो बात कहता हूँ – सुनों – इस संसार में जब किसी ने सोचा कि मैं लोगों का उद्धार करूँगा तो अपने उद्धार से भी वंचित हो गया , मैं लोगों के भीतर धर्म प्रकट करूँगा , मैं लोगों को आनंद दूँगा , लोगों को दुखों से मुक्त करूँगा – तो लोगों के लिए तो वह कुछ न कर पाया अपने जीवन को भी ऐसे ही खो दिया क्योंकि शब्दों में बहुत बड़ी शक्ति नहीं होती – होती तो भारतवर्ष के इस खून में राम और कृष्ण समा गए होते – बुद्ध, महावीर , मीरा, कबीर, चैतन्य – लहू में दौड़ रहे होते और खून में जो दौड़ता है व्यवहार भी वैसा ही बनता है । अगर हमारे खून में राम और कृष्ण होते तो हमारे व्यवहार भी वैसे ही होते – बुद्ध , महावीर, मीरा , चैतन्य , कबीर – ये कोई भी
होते तो हमारा व्यवहार वैसा ही होता पर शब्दों से कोई प्रभाव न पड़ा और पडेगा भी नहीं ।
इसलिए उन महात्माओं नें कहा होगा कि शब्दों से कभी सत्य को प्रकट नहीं किया जा सकता ।
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