विवेकानंद के वाक्य ‘उठो जागो’ पर बोलते हुए

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…….आज की राधाअष्टमी के पीछे भी कारण यही है कि हमारा जीवन सुन्दर हो , हमारा जीवन मंगलमय हो , हम बुद्ध बनें , हम बुद्धत्व की ओर अग्रसर हों , हमारी मूढ़ता का अब धीरे धीरे नाश हो और हम कह सकें -वेद के , कठोपनिषद के उस सूत्र को – “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” । विवेकानंद ने आधा ही बोला आधा छुपा गए , विवेकानंद महापुरुष हैं , उस समय में शायद उनको इतना समझ में आया कि इतना ही बोलूँगा तो काम चल जायगा क्योंकि उस समय वे स्वयं लिविंग थे , जीवंत थे इसलिए उन्होंने कहा ‘उत्तिष्ठत जाग्रत’ पर एक लाइन छुपा दिया उन्होंने वेद की बात को , बुरा मत मानना – कोई अल्टीमेट नहीं है इस दुनियाँ में ।
उसकी अगली लाइन है “प्राप्य वरान्निबोधत” – अर्थ होता है श्रेष्ठ तत्ववेत्ता गुरु ।
उठो जागो –
क्या करोगे जाग कर ? …. हड़ताल ? , क्या करोगे जागकर ? ….मशाल जुलूस ?
“उत्तिष्ठत जाग्रत ” व्हाट डू यू मीन बाई “उत्तिष्ठत जाग्रत”
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” …… उठो जागो और उन श्रेष्ठ सद्गुरु की शरण में जाकर उनसे जीवन के तत्व / तथ्य को सीखो – ये है वेद का पूरा पूरा श्लोक ।
आधा श्लोक तुमने पढ़ा , वे महात्मा हैं विवेकानंद – उन्होंने जगाने का काम किया और उस समय कहा कि मेरे पास आ जाओ पर आज मैं तुम्हें कहता हूँ “प्राप्य वरान्निबोधत ” -केवल उठ कर जागने से कुछ नहीं होगा , उठोगे , जागोगे – वह तो रावण भी उठा था , कंस भी उठा था , सब उठे थे पर क्या किया ? – “प्राप्य वरान्निबोधत ” – नहीं गए किसी श्रेष्ठ गुरु की शरण में इसलिए रावण बन गए , कंस बन गए , जरासंध बन गए ।
इसलिए मैं तुम्हें आज राधाअष्टमी के दिन एक और चीज का आह्वान करता हूँ कि वेद के इस सम्पूर्ण मन्त्र का उद्घोष करो , उपनिषद् के इस सम्पूर्ण मन्त्र का उद्घोष करो – “प्राप्य वरान्निबोधत” – मैं उठा हूँ , जगा हूँ , हे गुरुदेव आपकी शरण में हूँ – ये जगना हुआ , ये आना हुआ वरना यह श्लोक अधूरा रह जायगा और जीवन भी अधूरा रह जायगा ।
वेद ही प्रमाण है हमारे जीवन का , वेद जिनके भीतर प्राकट्य लेता हो , वेद जिनके मुखारबिंद से निर्झर झरता हो ऐसे सद्गुरु की शरणागति जीवन में मिल जाय फिर किस बात की चिंता- राधा भी तुम्हारी , कृष्ण भी तुम्हारे
, गुरु भी तुम्हारे और जीवन में जो दुःख , जो कष्ट , जो तकलीफ तुम उठा रहे हो अगर सिर्फ यह राधाअष्टमी तुम्हें राधा तत्वसे परिचित करा दे और कोई कारण समझ जाओ कि अब मैं साधारण दुःख की निवृत्ति के लिए एक दो दिन के लिए नहीं आया , इस राधाअष्टमी के बाद मेरे जीवन के दुखों का विनाश होगा क्योंकि मैं राधारानी को और गुरुतत्व को समूल दुखों के विनाश का तत्व मानता हूँ – कारण मानता हूँ ।

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