विद्वत्ता-Intelligence

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कोई पुस्तकों से देख कर बोलता है , कोई कंठस्थ कर लेता है – कई श्लोक कई चौपाइयाँ – तो हम बड़ा विद्वान समझते हैं उनको – बड़े विद्वान पुरुष हैं – उनको गीता याद है , रामायण याद है , भागवत याद है पर विद्वत्ता यह नहीं है कि आपकी मेमोरी कितनी स्ट्रांग है , आप याद कितना रखते हो बल्कि विद्वत्ता यह है , पाण्डित्य यह है कि इस वाणी से आपके जीवन से दुखों का गमन कितना हुआ , आप कितने सहज और प्रसन्नचित्त हुए ।
अगर यह न हुआ तो यह मौखिक ज्ञान है जिसे शास्त्र दो कौड़ी का ज्ञान कहता है क्योंकि बाकी तो सब चीजें थीं ही मालिनताएं – और दो चार श्लोक याद कर लेने का एक अहंकार ऊपर से हो गया है कि हमें तो गीता पता है , रामायण पता है , मैंने प्रवचन सुने हैं , मैंने उनकी बातें सुनी हैं तो ये सब हमारी जड़ता को दूर नहीं करते बल्कि मूढ़ता को और बढ़ाते हैं।
एक साधारण व्यक्ति को तो पता भी होता है कि वह मूर्ख है , मूढ़ है पर शास्त्रों का अवलंबन जिसने केवल मुखस्थ रूप से ले लिया है, हृदयस्थ नहीं — मुख और हृदय में अंतर है – आप स्वयं जानते हैं सब – दिल और वाणी में कितना अंतर है , मन और वाणी में कितना अंतर है – आप रोज ही प्रयोग करते हो – हृदय में कुछ होता है – मुख से कुछ और बोलते हो , आपको भी पता है कि मैं यह बात दिल से नहीं बोल रहा हूँ – दिल से स्वीकार नहीं कर रहा – व्यवहार निभाने के लिए , झूठे प्रेम को बचाने के लिए , अपनी विद्वत्ता दिखाने के लिए आप कई बार अपने हृदय की बात अपने मुख पर नहीं लाते पर आपको पता होता है ।
लेकिन जो सो कॉल्ड विद्वान हैं , जिन्होंने दो चार श्लोक और ये दो चार प्रवचन , कुछ किताबें , कुछ अनुष्ठान जीवन में अपनाए हैं उनको भी कभी कभी — कभी कभी न कहें – सदैव यह संदेह रहता है कि मैं भी तो विद्वान हूँ और उनका विद्वत्ता का जो अभिमान है – हैं तो आधे भरे हुए “अधजल गगरी छलकत जाय” पर अभिमान संपूर्णता का है ।
मैंने कई बार आपसे कहा है कि जो यह जानता हो कि मैं नहीं जानता उसे सिखाना बड़ा आसान है पर जो यह जान कर बैठा है कि मैं यह जानता ही हूँ उसे सिखाना इस जगत में सबसे कठिन है और वह जगत का सबसे दुखी व्यक्ति है क्योंकि अपने ही अज्ञानता के कारण जीवन में आने वाले बहुत सारे दुखों से वह रूबरू होता है ।
विद्वान और मूढ़ में क्या फर्क है , किसको मूर्ख कहते हो और किसको विद्वान कहते हो ? जगत की कुछ उपलब्धियों को प्राप्त कर लेने को विद्वान कहते हो – धन बल , जन बल , प्रतिष्ठा बल — इसे विद्वत्ता कहते हो ? या जगत में एकदम निरीह प्राणी बन कर रहना , न जानना – उसे मूर्खता कहते हो ?
जब व्यापक परिवेश में इसकी चर्चा करेंगे तो आपको समझ में आएगा कि अपूर्णता में भी जिसे संपूर्णता का बोध हो चुका है , जिसके मन ने यह समझा दिया है कि तुम पूर्ण हो गए हो , तुम सीख चुके हो — शास्त्र , संत , गुरु और भगवंत ‘मूढ़’ उन्हें ही कहते हैं ।
अर्जुन के सामने कई बार भगवान ने मूढ़ शब्द का प्रयोग किया है , ये मूढ़ शब्द का प्रयोग भगवान ने गीता सुनाने के बाद भी किया है । ऐसा नहीं कि श्रवण के पहले वह मूढ़ था और सुनने के बाद बड़ा विद्वान हो गया ।
समस्त गीता भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से सुनने के बाद भी अर्जुन को भगवान ने कई बार मूढ़ शब्द का प्रयोग किया – ऐ मूढ़ , ऐ मूर्ख – तो फिर अगर गीता सुन लेने से ही कोई विद्वान हो जाता , रामायण और भागवत की कथाओं के सुन लेने से ही कोई विद्वान हो जाता – जितनी कथाएं हैं भगवान की – सत्यनारायण और तुम्हारे व्रत – जो पण्डित आते हैं – तुमको सुनाते हैं – उनको सुन लेने से ही कोई विद्वान हो जाता तो जब साक्षात भगवान ही सुना रहे हों किसी को – वह भी श्रीकृष्ण – चतुर शिरोमणि – कृषणं वंदे जगद्गुरुम – उनके इतना श्रवण कराने के उपरांत भी अर्जुन की मूढ़ता नहीं गयी । इसका कारण क्या है – पता है ? अर्जुन का यह समझ लेना कि अब मैं सब समझ गया ।
इसलिए कई बार कई क्षेत्र में हमें यह भ्रान्ति हो जाती है कुछ सत्संग करते , कुछ सुनते , कुछ बैठते , कुछ पूजाएँ करते – जैसे अखण्डानन्द सरस्वती के सामने उस व्यक्ति को ज्ञान की अनुभूति हो गयी – उसने कहा – अब मुझे ज्ञान आ गया । अखण्डानन्द जी ने क्या कहा – कहा बैठ जाओ – अभी कई बार आएगा – आएगा – जाएगा ।
चूँकि यहाँ अल्टीमेट तो कुछ है ही नहीं – हरी अनंत हैं तो यहाँ अंत है ही नहीं – न ज्ञान का अंत है न मूढ़ता का अंत है ।
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