मन्त्र साधना

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याद रखिए – चाहे प्रेम हो या नफ़रत – इन दोनों में शब्द का अभाव हो और अभिव्यक्ति का प्रभाव हो , शब्दों से प्रेम नहीं हो सकता – आई लव यू , आई लव यू , आई लव यू , आई लव यू – पता नहीं कितने लोग कितनो को कहते रहते हैं , जूते से पिटते भी हैं सड़क पर यही कहने के कारण और घर में भी ऐसा है – हम बोलते ही रहते हैं इस शब्द को पर जब उसकी अभिव्यक्ति नहीं हमारे आचरण में तो कौन मानेगा हमारे प्रेम को । यह तो वही बात हो गयी कि – आजकल रामनाम का बैंक खुला है – तथाकथित लोगों ने खोला है उसको – एक लाख नाम लिख कर दे दो , बैंक में जमा कर दो – तुम दो लाख लिख देना श्री राम श्री राम श्री राम – राम राम राम राम राम राम – और वह भी होमवर्क करने जैसा हो गया – राम राम राम राम – रोज सौ लिखना है , लिख कर पीछा छूटा , उसको जमा कराना है ।
यह जिस भाव से जिसने दिया उसके भाव पर मैं संदेह नहीं करता पर जो लोग यह कर रहे हैं वे मूढ़ हैं मेरी निगाह में क्योंकि आपने इसको भी एक कर्म बना लिया ।
भगवान से आपका सम्बन्ध भाव प्रधान है – “भावग्राही जनार्दनः” पर यह तो एक कर्म हो गया , सांसारिक कर्म – स्कूल में जैसे हमको होम वर्क मिलता है वैसे ही हमको एक लाख राम नाम लिखना है और लिखने से अगर राम प्रकट भी हो जाँय तो उनसे बोलना क्या है , माँगना क्या है – यह भी पता नहीं , उनके ज्ञान को आत्मसात कैसे करना है – यह भी पता नहीं ।
कई बुद्ध पुरुषों ने भगवान के नाम को बार बार लेने को मना किया , जो लेने के लिए कहते हैं उनका भी रीज़न है – वह मैंने भागवत में बताया था तुमको कि ये स्टेजेज़ हैं – सीढ़ियाँ हैं – राम का नाम तो वही है पर पहली सीढ़ी है – अब जिस शिद्दत से , जिस भावना से , जिस गहराई से , जिस गूढ़ता से , जिस अटैचमेन्ट के साथ आपने दूसरा नाम लिया तो दूसरी सीढ़ी बन गयी , अटैचमेन्ट और बढ़ा राम के साथ तो तीसरी बन गयी – अब ये आपके लक्ष्य तक पहुँचने के लिये सीढ़ियाँ बनती जा रही हैं यही नाम की ।
पर नाम का प्रभाव जानें बिना नाम का जप – अब वो गोस्वामी तुलसीदास ने कहा जरूर है – “भाय कुभाय अनख आलसहू , नाम जपत मंगल दिस दसहू” – तो भाय या कुभाय कैसे भी नाम लें , गोस्वामी जी ने इसलिए कहा शायद कि कुभाव से लेते लेते लेते लेते आखिर व्यक्ति किसी चीज का जब बार बार रिपिटीशन करेगा , बार बार जपेगा तो जानने की भी तो इच्छा होगी कि आखिर ये हैं कौन , इनसे मेरा काम क्या है तो शायद ग्रैजुअली राम के नाम का प्रभाव समझ आ जाय और उस प्रभाव को समझ कर और उसको अपने स्वभाव में ले आए सम्मिलित कर ले ।
हैबिट ही स्वभाव बन जाता है , जैसे एक इलास्टिसिटी होती है किसी चीज की तो एक नाम जपने की भी इलास्टिसिटी है – वह जपते, जपते , जपते , जपते फिर एक स्वभाव बन जाता है , बीच में छोड़ दें तब कुछ न मिलेगा तो फिर वहां तक जाना पड़ेगा जहां जाकर रबर टूटती है लेकिन न जानते हुए – न जानने का प्रयत्न करते हैं , न समझनें का प्रयत्न करते हैं ।
गुरुजन आते हैं , संतजन आते हैं समझाते भी हैं फिर भी समझते नहीं । बस ईज़िली – वही ठीक है बस – दस बार नाम ले लूँगा , चलिए – चलिए ले लूँगा – ठीक है , उपेक्षापूर्ण या भय पूर्ण , भय से भी नाम लेने में बड़ी मुश्किल है ।
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