पातञ्जलि सूत्र – स्थिर सुखम् आसनम्

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पहले तो अपने मन में इस बात को स्थिर कर लो , समझ लो इस चीज को कि अगर तुम ज्यादा प्रयत्नशील हो , बहुत स्ट्रगलिंग लाइफ है – दैट मीन्स – आप सही रास्ते पर नहीं जा रहे हो , तुम्हें रुकना होगा और रुक कर विचार करना होगा और फिर से धारा का चुनाव करना होगा कि जो प्रतिकूल धाराओं में जा रहे हो – अनुकूल धारा का चुनाव करो ।
वैसे तो हर व्यक्ति के भीतर प्रज्ञा है – इन्हेरेन्ट – कहीं बाहर से नहीं आनी । इस शरीर में जो तुम जी रहे हो मनुष्य के शरीर में – इसमें कोई भी चीज बाहर से लाने योग्य है ही नहीं – सब है , विशेषकर आध्यात्मिक बातें ,
आध्यात्मिक जीवन। आध्यात्मिक जीवन का मेरा सीधा सीधा अर्थ है हैप्पी लाइफ , अ ब्लिसफुल लाइफ , आनंदपूर्ण जीवन – वैसे जीवन शब्द में आनंद छुपा हुआ है पर चूँकि हमने इसे दुःखमय बना लिया है इसलिए हम इसके साथ आनंद जोड़ते हैं – आनंदपूर्ण जीवन ।
पातञ्जलि का एक सूत्र है , ध्यान के सम्बन्ध में – आसान के सम्बन्ध में “स्थिर सुखम् आसानम्” – यह सूत्र है पातञ्जलि का । पातञ्जलि कहते हैं कि जिस आसान में सुख स्थिर हो वही आसान तुम्हारे लिए श्रेष्ठ है और हमने तो आज तक यही जाना है कि साधना करने में जो आसान तकलीफदेह हो उसी को अपनाना चाहिए । बहुत सारे आसन के नाम हैं – ज्यादातर पशुओं के नाम पर , मनुष्यों के नाम पर तो आसन काम ही हैं – तुम सब खोजना – ज्यादा पशुओं के नाम पर हैं , एक आसन है – शव आसन ।
इसलिए मेरे गुरूजी ने मुझसे कहा था – जब भी कुछ करना , सुखासन में करना , जरूरत नहीं किसी और आसन की और तब पातञ्जलि का सूत्र उन्होंने मुझे नहीं बताया था , बाद में जब मैंने ढूँढा , मुझे मिला कहीं से , तब मुझे लगा पातञ्जलि भी यही कहते हैं , कृष्ण भी यही कह रहे हैं । आसन दुखदाई हो तो ध्यान बड़ा अच्छा होगा , ध्यान बड़ा गहरा होगा , हम बड़े योगी होंगे – यह भूल है ।
आसन जितना सुखपूर्ण हो , उतना अच्छा – इसीलिये तो भागवत की कथाओं में मैं कहता हूँ कि तुम सोफे पर बैठ कर सुन लो कि कैसे भी सुन लो – सुनना महत्वपूर्ण है और जो तुम्हारे लिए आचरणीय है वह आचरण में लाना महत्वपूर्ण है ।
सारा प्रयत्न तो इसी में चला गया कि बैठना कैसे है , सारी एकाग्रता तो इसी में चली गयी कि पालथी कैसे मारनी है , तो जब इतने प्रयत्न से तुम बैठोगे तो सुनोगे क्या ? और ऐसे कष्ट के माहौल में सुनी हुई बातें तुम्हे फिर याद भी क्यों रहेंगी ? और फिर तुम्हारा अवचेतन मन यह कहेगा कि जिसको सुनने में इतनी तकलीफ है उसके आचरण में तो और तकलीफ होगी , इसीलिये तो हम नहीं अपना पाते जीवन में सद्गुरु की बातें । मास्टर की बातें सुनने में थोड़ी अच्छी कभी लग गईं पर जीवन में अपनाने से हम बचते हैं , हमारी ऐसी दृढ़ धारणा है कि ये बातें सुनने के लिए ही काफी हैं – करना हमें वही है जो हम करते हैं पर सुन लेते हैं चलो यह भी अच्छा है …………

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