दान का अर्थ

Events Guruvani

याद रखो – अगर तुमने यह समझ लिया कि मैंने उसके लिए कुछ किया तो यह दान न रहा , यह सिम्पैथी हो गई , सहानुभूति हो गई । बेचारा भूखा था इसलिए हमने उसको रोटी दे दी , बेचारे के पास कपडे न थे इसलिए तुमने अपने पुराने कपडे दे दिए , बेचारे के पास खाने की दवाइयाँ न थीं तो तुमने कुछ मदद कर दिया लेकिन जिसके कारण तुमने यह किया वह तो पूर्ण न हुआ , उसके काम बन गए – सांसारिक काम – पर तुम परमात्मा से संसार की ओर दो कदम और नीचे गिर गए ।
इसलिए तुमने देखा होगा कि देने वाले लोगों के हृदय में ज्यादा अहंकार है ।
दान देकर भी लोग धर्म के मूल अर्थ को समझ नहीं पा रहे और अब तो परसेंटेज भी चलने लगे हैं – तुम कमाओ और दस प्रतिशत दान कर दो तो तुम्हारा बाकी का धन शुद्ध हो जायगा ।
न जाने किस शास्त्र में लिखा था यह , किस मूर्ख ने पहली बार यह बात फैलाई थी , कहाँ से यह बात आई थी – आज तक किसी शास्त्र में मुझे यह बात न मिली और ये शास्त्र होंगे भी तो तुम्हारे अपने बनाए हुए होंगे , ये शास्त्र होंगे भी तो तुम्हारे जैसे लोभी और पाखण्डियों के बनाए हुए होंगे क्योंकि जो भी ऋषियों के शास्त्र हैं उसमें तो सीधा सीधा दान का यह अर्थ लिखा गया है कि अब धीरे धीरे तुम ममता से दूर हो रहे हो पर यहाँ तो दान इसलिए ही दिया जा रहा है कि तुम एक रुपैय्या दोगे तो वह दस रुपैय्या देगा !… तो यह तुम्हारी ममता को दस गुना बढ़ा देगा । जिस ममता से मुक्त होकर तुम परमात्मा के अंश बन सकते हो , उस सागर में विलीन हो सकते हो – मैं तुम्हे मना करता हूँ – मत दो ऐसा दान ।
अगर तुम्हे नाम की फिकर है तो खूब दो , केवल शरीर को अगर अपना समझते हो तो खूब दो – शिलाएँ लिखवाओ , पट्टिकाएँ लिखवाओ अनाउंसमेंट करवाओ , लेकिन अगर तुम्हारी इच्छा दुखों से मुक्ति की है , तुम्हारी इच्छा परमात्म प्राप्ति की है , तुम्हारी इच्छा आनंद के गोद में बैठने की है तो मैं तुम्हें सत्यनिष्ठा के साथ कहता हूँ – मेरी इस बात को भूलना नहीं क्योंकि यह मैं नहीं श्रीकृष्ण कह रहे हैं , यह मैं नहीं वे ऋषि कह रहे हैं जिन्होंने दान की महिमा को समझा है ।
तुम्हारे घर की सफाई के लिए किसी ने कोई केमिकल तुम्हे दिए और बाद में पता चला कि वही केमिकल तुम्हारे घर को और गंदा कर गया ।
दान तुम्हारे चित्त की सफाई के लिए था अंतःकरण की जो मालिनताएं हैं वह उन मलिनताओं से मुक्त होने की एक विधि था – दान , पर यह दान देकर तुम्हारे अंतःकरण और मलिन हो गए , तुम और दानवीर कहलाने लगे ।
मैंने देखा है कई व्यक्ति मुझे भी बहुत सी वस्तुएं देते हैं, मैं स्वीकार भी करता हूँ पर जब बरसों गुजर जाते हैं तो वे दूर से दिखाते हैं कि देखो महाराज जी की पगड़ी में जो लगा है न वह मैंने दिया है , ये जो जूते पहने कर चल रहे हैं वह मैंने बनवाया था पुणे से और यह जो देख रहे हो वह मैंने स्विट्ज़रलैंड से मँगवाया था – यह कैसा दान है ?
तुमने दे भी दिया और तुम्हारी ममता अभी तक लगी है ।
दान तो सीधा सीधा तुम्हें ममता से मुक्त करता है और तुम भी जानते हो – गीता पढ़े हो तो कि मोह ममता – यही तुम्हें आनंद से दूर रखे हुए है – तो यह तुम्हारे लिए दवाई बन गयी या जहर बन गया ।
इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ कि हमारे शास्त्रों में वर्णित किसी भी शब्द का जब तक किसी लिविंग मास्टर के चरणों में बैठ कर उसके गूढ़ार्थ को न समझ लो तब तक उसे अपने प्रयोग में मत लाओ क्योंकि वह तुम्हारे लिए बंधन हो सकता है , वह तुम्हारे लिए फाँसी का फंदा बन सकता है । इसलिए जब भी किसी को कुछ देने की इच्छा अंदर से हो तो बड़े कातर और दीन भाव से देना , दीनता के आसन पर बैठ कर देना ।
मैंने कई बार तुमको कहा है कि जब पण्डितों और पुरोहितों को देते हैं तो हाथ में जल होता है और जब सद्गुरु को कुछ देते हैं तो आँख में जल होता है ।
मैं आज तुमसे कहता हूँ कि इस दुनियाँ में जब भी किसी को कुछ दो तो आँखों में जल रख कर दो क्योंकि इसने मुझे ममता से मुक्त किया, इसने करुणा की मेरे ऊपर , इस वस्तु की ममता से अब मैं मुक्त हो रहा हूँ – तब तुम्हारा दान गीता का दान होगा , तब तुम्हारा दान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में आए हुए दान को सार्थक करेगा, उसका यथार्थ सत्य तुम्हें समझ में आएगा ।
इसलिए कोई करे न करे , तुम जितने लोग सुन रहे हो आज के बाद दान सहानुभूति से मत देना । ‘बिचारे को जरूरत है’ – हुआ करे , आर यू गॉड ? तुम कौन हो ? क्या समझ कर सहानुभूति दिखा रहे हो ? किसी और पर या खुद पर सहानुभूति करने वाला कभी धार्मिक नहीं हो सकता । सहानुभूति ! किसलिए ? और स्वयं के ऊपर सहानुभूति करने वाला तो धार्मिक हो ही नहीं सकता , जो स्वयं को सदा बिचारा समझता हो वह व्यक्ति कभी धर्म के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता ।
जरा याद करो अर्जुन ने कृष्ण से पहले अध्याय में क्या कहा है और कृष्ण ने पहला शब्द क्या कहा है ‘क्लैव्य’ , ‘कायर’ , ‘हिंजड़े’ । कोई दूसरा होता तो इतने अच्छे शब्द थे अर्जुन के कि पाँव पकड़ लेता अर्जुन के कि कितनी सत्य बात है – पर भगवान का पहला शब्द होता है – ‘कायर’ – सहानुभूति न दिखाया कृष्ण ने क्योंकि कृष्ण क्रान्ति चाहते हैं , कृष्ण बने बनाए ढर्रे में चलना नहीं चाहते , कृष्ण नया रास्ता बना रहे हैं हम सबों के लिए और तब जाकर सोलहवें अध्याय में दान के महत्त्व को समझाया है ।
वास्तव में गीता तो सोलहवें अध्याय से प्रारम्भ हुई है – बाकी के गीता में समझाए हुए शब्दों का प्रयोग अर्जुन ने अपने जीवन में कभी किया भी नहीं , कोई मतलब नहीं, न कर्म योग से उसका मतलब , न अष्टांग योग से उसका मतलब , किसी योग से उसका कोई मतलब नहीं ।
सोलहवें अध्याय से अर्जुन के समझ में थोड़ी थोड़ी बात आने लगी और अट्ठारहवें अध्याय में आकर प्रपन्न हो गया , प्रपत्ति हो गई ।
देखो ! जो राम के पूर्वज थे रघु – जब उनके पास ब्राह्मण निष्क लेने आया , ( जैसे डॉलर है , यूरो है वैसे निष्क था ) तो रघु ने दिया उनको और देने के बाद रघु से पूछा गया कि आपने इतना बड़ा दान दिया , रघु ने कहा मूर्ख हो तुम , धन्य है यह ब्राह्मण , यह मेरी ऐसी अवस्था में भी मेरे पास आकर और जो दान दान मैं करता रहता हूँ वास्तव में दान के उस अर्थ को वह समझा गया ।
कनक्ल्यूड करता हूँ दो शब्दों में :
जो देना तुम्हारे भीतर में सहानुभूति पैदा करे उस दान से दूर हो जाओ ।
जो देना किसी की जरूरत को पूरा कर दे और तुम जरूरत पूरा करनेवाले बन जाओ – दूर हट जाना क्योंकि यह आध्यात्मिक क्रिया नहीं है , यह सांसारिक क्रिया है ।
दान आँखों में जल लेकर और लेने वाले को मन ही मन प्रणाम करके कि आज कमाल हो गया , आज एक वस्तु से तुमने मेरी ममता हटा दी , बस ऐसी ही कृपा बनाए रखना ।
तपस्या , दान , धर्म , उपवास , व्रत , नियम – इनमें से किसी एक को भी पकड़ लो तो परमात्मा तक पहुँच सकते हो पर पहले इसके अर्थ को समझ जाओ ।
इसलिए गीता के परतों को खोलने की मेरी इच्छा है फिर एक एक चीजो की परतों को समझना तब जीवन में गीता सार्थक होगी , तब हमारा समझना सार्थक होगा और तब धीरे धीरे तुम्हारी यात्रा गीता के श्रीकृष्ण के अनुसार चलेगी तब तुम स्वयं आनंद स्वरुप हो और यह समझ पाओगे कि उस आनंद स्वरुप होने का अर्थ क्या है क्योंकि अभी तक सिर्फ शब्दों में सुना है तुमने कि मैं आनंद स्वरुप हूँ , सच्चिदानंद की संतान हूँ पर यह सुनते ही जन्म लिया और सुनते ही विदा हो जाओगे उसके बीच में आनंद स्वरुप की उपलब्धि हो जानी चाहिए पर वह तभी होगा जब इन शब्दों के सात्विक , सार्थक और व्यावहारिक अर्थ को जान जाओ जिसके लिए श्रीकृष्ण ने पैदा किया है इन शब्दों को

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Rating*