तुम जीवन में क्या चाहते हो

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न धर्म , न संस्कार , न धन –
इस दुनियाँ में सबसे महत्वपूर्ण तुम्हारा आनंद है – चाहे वह बालक हो या वृद्ध हो , चाहे गरीब हो या धनवान , गोरा काला – ये सब किस लिए प्रयत्नशील हैं ? इनके जीवन का बस एक ही लक्ष्य है – हाउ टु लिव अ ब्लिसफुल लाइफ – कैसे आनंदपूर्ण जीवन को हम जीएँ । जगत में जितने भी कार्य हैं , जितने भी परिश्रम हैं वो सत्य हैं – असत्य हैं , झूठ हैं , कपट हैं , फ़रेब हैं – सब का उद्देश्य बस इतना ही है कि सब आनंदित होना चाहते हैं । शराब की भट्ठियों में बैठे हुए लोग व सत्संग में आकर बैठे हुए लोग – इनमें ज्यादा अंतर नहीं है । तत्व की दृष्टि से दोनों एक ही हैं – नाराज़ मत होना – नाराज़ होओगे तो वेद और शास्त्र तुम्हारे माथे पर रख दूँगा क्योंकि ज्ञान की दृष्टि से इस जगत में परमात्मा को छोड़ कर और दूसरे किसी का अस्तित्व है ही नहीं , चारो तरफ वही वही है – रावण में भी वही है और राम में भी वही है , कृष्ण में भी वही है और दुर्योधन में भी वही है – कंस में भी वही है । यह तत्व की बात है – अब व्यवहार अलग है । व्यावहारिक दृष्टिकोण से एक शराबी के शराबखाने का प्रयोजन भी आनंद है और हमारे तुम्हारे यहाँ सत्संग में आकर बैठने का प्रयोजन भी आनंद है । जो इस संसार में सत्य और ईमानदारी का जीवन जीता है उसको लगता है कि उससे उसे आनंद की प्राप्ति होगी । कोई झूठ कपट और बेईमानी में जीता है क्योंकि उसकी समझदारी में उसे आनंद की प्राप्ति कपट से ही होती है ।
इसलिए एक जगह पर हम सब कॉमन हैं – एक हैं ।
हर जीव अपने सुख शान्ति और आनंद के लिए प्रयत्नशील है । काम अलग अलग हैं , रास्ते अलग अलग हैं , सोच अलग अलग है , विचारधाराएँ अलग अलग हैं पर चाह सब की एक है ।
परमात्मा ने भी इस जगत में आनंद प्राप्ति के कुछ सिद्धांत बनाए हैं नीतियाँ बनाई हैं – जबतक उन नीतियों का पालन नहीं किया जाता तबतक – मृगमरीचिका – भ्रम तो हो सकता है तुम्हें की तुम अब शांत और आनंदित होने वाले हो पर जैसे मैंने कई बार कहा है – गोरी गजनवी और सिकंदर की तरह अकूत संपदा के मालिक होने के बाद भी भिखारियों की तरह यहां से विदा हो जाओगे …..

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