क्या भक्तों को दुःख नहीं मिले

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परिस्थिति जन्य दुःख इस संसार में ऐसा कोई भक्त नहीं हुआ जिसको न हुआ हो – प्रह्लाद , मीरा , ध्रुव – परिस्थितियाँ अनुकूल हैं क्या इनकी ? पर ये दुखी क्यों नहीं हैं ज्यादा ? – स्वस्थिति में हैं । परिस्थितियाँ किसी की अनुकूल नहीं रहीं – इस दुनियाँ में – भगवान की नहीं रहीं , राम और कृष्ण की नहीं रहीं , बुद्ध की नहीं रहीं । एक का नाम बताओ, कि नहीं इनकी तो परिस्थिति बड़ी अनुकूल थी और अनुकूलता में इन्होंने बुद्धत्व को प्राप्त कर लिया , मैं जीवनी बताए देता हूँ कितनी अनुकूल परिस्थिति थी इनकी । -परिस्थिति – इसका नाम ही है पर स्थिति – पर – दूसरी – दूसरी के ऊपर हमारा कंट्रोल है नहीं , तो दूसरों के द्वारा प्रकट की गयी स्थिति को ही परिस्थिति कहते हैं , दूसरों के द्वारा जो प्रकट की गयी है तुम्हारे सामने ।
तुम घर में आराम से बैठे और जाकर चार पाँच गुंडे खड़े हो गए पिस्तौल लेकर – ऐसे करेंगे – वैसे करेंगे , इसमे तुमने क्या किया है ? तुमने तो कोई स्थिति पैदा नहीं की पर स्थिति उन्होंने पैदा कर दिया , इसमें तुम्हारा कोई हाथ नहीं है , उन्होंने पैदा कर दिया विकट । अब उस संकट में कहीं प्रहलाद की तरह स्थिर रहते हो , मीरा की तरह स्थिर रहते हो , इस संकट में भगवान राम कृष्ण की तरह स्थिर रहते हो या घबरा जाते हो या होशोहवास खो देते हो या तुम भी ऊटपटांग हरकत कर देते हो – बस इतना ही अंतर है तुममें और प्रहलाद में ।
परिस्थिति पैदा कौन किया – हिरण्यकश्यपु वो तो कह रहा है – मारो , काटो , इसको आग में डालो – प्रहलाद थोड़े ही कह रहा है कि मुझको आग में डालो , पहाड़ से गिराओ – परिस्थिति पैदा कर रहा है हिरण्यकश्यपु – पर प्रह्लाद परिस्थिति का गुलाम नहीं है , प्रह्लाद अपनी स्वस्थिति में स्थित है , अपनी स्थिति में – नारायण हरि – उसने हर परिस्थिति में भी सुख को खोज लिया । उसका जो उत्तम विश्वास है , उसका जो श्रेष्ठ विश्वास है , उसने जिस श्रेष्ठता को उपलब्ध किया है , उसने उसी उम्र में जो आत्मतत्व को जाना है तो उसको दो बातें पता हैं – ये मूढ़ मुझे जलाना चाहता है – शरीर तो जलाएगा – कोई बात नहीं , शरीर तो एक दिन जलाना ही है । प्रहलाद को स्थिर रहने का दो ही कारण हो सकता है – एक कारण तो यह है कि यह मेरे शरीर को जला रहा है , आत्मा थोड़े ही जला पाएगा । दूसरी स्थिति है कि ” जाको राखे साइयाँ मार सके ना कोय” – ये दुष्ट मुझे मारना भी चाहे तो नारायण मेरे साथ हैं , मेरा क्या हो सकता है !
यह दो ही अवस्थाएं हैं जिसमें प्रह्लाद निरुद्विग्न रह सकता है – निर उद्विग्न – हम सब उद्विग्न हैं – हमारा दोष क्या है – उद्विग्न हैं , थोड़ी सी परिस्थितियाँ प्रतिकूल चली गयीं उद्विग्नता आ गयी -…हमारे साथ ऐसा ही होता है …मेरे साथ रोज ऐसे ही करते हैं …. जब से इस घर में आए हैं मेरे साथ ऐसा ही होता है – ये उद्विग्नता आ गयी ।
प्रहलाद निरुद्विग्न है कोई भी परिस्थिति तुम पैदा करो – प्रहलाद कहता है – मैंने थोड़े ही पैदा किया है – तुमने पैदा किया है तुम भोगो और तुम देखोगे की परिस्थिति पैदा किया हिरण्यकश्यपु ने और भोगा भी हिरण्यकश्यपु और स्थिति में स्थित है प्रहलाद ।तो आग में बैठ कर भी किसी को आज तक देखा है मुस्कुराते हुए ।
उसकी एक छोटी सी झलक है जो मैं भागवत में कहता हूँ कि जब हम माइक्रो ओवन लेते हैं और अंदर में सामान तैय्यार हो जाता है तो बढ़िया सुन्दर ग्लब्ज़ लगा कर माता लोग कटोरा निकाल लेती हैं तो अभी पात्र भी गर्म है माइक्रो ओवन भी गर्म है पर इसको गर्मी नहीं लग रही है क्योंकि इसने ग्लब्ज़ पहन लिए हैं तो प्रहलाद हों मीरा हो या जो भी भक्त हों उन्होंने ग्लब्ज़ पहने हुए हैं और ये ग्लब्ज़ दो ही हो सकता है – या तो अपनी स्थिति को वह जानते हैं – मैं आत्मा हूँ – शरीर से वे रिलेट नहीं करते- ये बहुत बड़ा ज्ञान है – आप इसको समझ लो , इसको जान लो – अगर आपको यह विश्वास हो गया कि मैं आत्मा हूँ – केवल शरीर नहीं हूँ तो आपकी उद्विग्नता मिट जायगी ।
और दूसरी “जाको राखे साइयाँ मार सके ना कोय”
– परमात्मा मेरे साथ हैं ।……

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