क्या परमात्मा तुम्हें दुःख देना चाहते हैं। ?

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भगवान को तो मानते हो न ? ही इज़ ऑलमाइटी – सर्वशक्तिमान हैं –
वो भला क्यों चाहेंगे कि कोई दुःख में रहे और अगर ऑलमाइटी हैं तो सबको सुखी क्यों नहीं कर देते ? सबको आनंद क्यों नहीं दे दे रहे हैं ? ऑलमाइटी
हैं न – सब कुछ कर सकते हैं न – तब कर देना चाहिए ।
इतने दिन से पूजा कर रहे हो , पाठ कर रहे हो , रिझा रहे हो – फिर भी रो रहे हो , फिर भी दिल में कष्ट है , फिर भी तुम्हें बातें लग जाती हैं , मान हो जाता है , अपमान हो जाता है , किसी से भी मुँह फुला लेते हो – क्यों ?
तुम्हें तो बिलकुल उनके साथ मिक्स हो जाना चाहिए था – जैसे वो अनंत हैं , विराट हैं तुमको भी हो जाना चाहिए था ।
वो नहीं चाहते या तुम नहीं चाहते ?
तुम जब खोजोगे तो पता चलेगा कि वो तो चाहते हैं – जैसे गुरु चाहता है वैसे परमात्मा भी चाहते हैं पर दोनों जगह बेईमानियाँ तुमने ही की हैं – उससे भी बेईमानी करते हो , गुरु से भी करते हो ।
जबतक तुम नहीं चाहते , तुम उनका साथ नहीं देते – वो अकेले कुछ नहीं कर सकते ।
एक व्यक्ति बढ़िया खेत जोत रहा था , अपने खेत में लगा हुआ था , एक आदमी बगल से आकर बोला – वाह वाह वाह – परमात्मा कितना दयालु है , कितना आपके लिए कर रहा है -फिर बारिश हो गयी , पौधे लग गए , वह व्यक्ति फिर बोला – वाह वाह वाह – परमात्मा ने क्या तैयार किया है । खेत वाला व्यक्ति बोला – परमात्मा जब तक अकेले था तो यह खेत बंजर ही था , मैं लग गया तो यह लहलहा गया । वह अकेला था तो बंजर था — बात बड़ी गंभीर है , बड़ी गहरी है , समझने की है – वह परमात्मा तो पहले भी था , खेत भी था , बारिश भी होती थी – पर वह बंजर था पर जैसे ही तुम परमात्मासे मिल गए अब वहां फसलें लहलहाने लगीं ।
तुम सोचते हो परमात्मा मेरे साथ नहीं मिल रहा , गुरु मेरी सहायता नहीं कर रहा – गुरु मेरे साथ खड़े नहीं हैं — अरे ! यू आर रॉंग , गलत हो तुम — ही इज़ आल्वेज़ विद यू – वह सब समय तुम्हारे साथ है – तुम नहीं हो , तुम साथ नहीं दे रहे हो – “तुम अगर साथ देने का वादा करो , मैं यूँ ही मस्त नगमें लुटाता रहूँ ”
तुम साथ नहीं देते , तुम आते नहीं , स्वीकार नहीं करते ।
तुमने छोड़ दिया है कि अच्छा ! बड़े काबिल हो तो ज़रा करके दिखाओ तो उन राजा के बेटों की तरह — “अच्छा ! पढ़ाने आए हो – जरा पढ़ा कर दिखाओ – खेल खेल में भी गिनती नहीं गिनूँगा।”
अगर ऐसी तुम्हारी इच्छा है भीतर से और कई लोगों की है पर वे जानते नहीं , विचार नहीं करते , विचार ही नहीं करते क्योंकि मन उनको गाइड करता है , मन उनको घुमा रहा है , मन के थपेड़े उनको लग रहे हैं ।
इसलिए दूसरा कोई उपाय नहीं है इस दुनियाँ में — एक मात्र उपाय है — या तो मन की मानो या तो मन को परमात्मा और गुरु के चरणों में सदा के लिए विलीन कर दो ।

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