आहार – विहार

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आवश्यक आवश्यकताओं के लिए जूझते हुए मरते मैंने किसी को नहीं देखा , कोई यदाकदा अखबारों में आता है कि भूख से उड़ीसा के कालाहाँड़ी में एक आदमी मर गया पर यह कभी सुना है कि खाना खा खा फ़ूड प्वायजनिंग से कितने लोग मर रहे हैं – पर यह भी एक सत्य बात है । भूख से जितने कम लोग मरते हैं ज्यादा खा खा कर उससे ज्यादा लोग मर रहे हैं पर वह कोई न्यूज़ नहीं बनती है । क्या हुआ – वो गलत पी गए , गलत खा लिए , पार्टी से आए खाकर – उसके बाद यह हो गया , शुगर था उसके बाद भी मिठाई खाना नहीं छोड़ा , इतना हार्ट ब्लॉकेज था उसके बाद भी आलू चॉप खा ही गए – इन सब के कारण ।
भूख से मौत के कारण शायद ही कोई हॉस्पिटल में मिले पर गाँवों में भी मैंने देखा है – हालाँकि इस बात को पूर्णतः मैं काटता नहीं कि भूख से मृत्यु नहीं होती – कभी कभी नहीं मिलता भोजन — आप ज़रा याद करो और बताओ की तुम्हारी एरिया में भूख के कारण कितनी मौत हुई है जब से आपको होश आया है – खोजना पड़ेगा – हाँ वह उस गाँव में 1987 में एक हुआ था – पेपर में आया था -फिर ज़रा आप डॉक्टर के पास या हॉस्पिटल चले जाँय – यही डॉक्टर से पूछो कि अनावश्यक खाने के कारण कितने लोग मरे हैं ? – किनका किनका जीवन गया है ? — लम्बी फेहरिस्त आपको मिलेगी – लम्बी लिस्ट – वो शुगर से मरा , वो हार्ट अटैक से मरा – हार्ट अटैक क्या है – आप डॉ . हो तो जानो इसको ।
जीवन के शारीरिक जितने भी रोग हैं वो हमारे आहार और विहार के कारण होते हैं ।
तो आहार और विहार ! विहार मतलब विचरण करना , घूमना , जाना और आहार मतलब जो हम लेते हैं ।
तो केवल शारीरिक तौर पर अगर मैं लेता हूँ – हम जो खाते हैं उसको ही मैं लेता हूँ क्योंकि आहार का व्यापक अर्थ मैंने आपको समझाया है कि भगवत दर्शन आँखों का आहार है , भगवत कथा कानों का आहार है , और हरि नाम में पाँव थिरकते रहें , हाथ से तालियां बजती रहें – यह हाथ और पाँव का आहार है ।
आहार तो सबके अलग अलग हैं पर सीधा सीधा एक भोजन जिसको हम कहते हैं – खाने को रोटी और दाल को समझते हैं – वही लेते हुए आप देखेंगे , ज्यादातर लोग बीमार हैं और बीमारी से मरेंगे , चलो – अब कुछ साठ साल जी भी गए तो उसको क्या आप स्वाभाविक मौत कहते हो ? तो जो इस कलिकाल में जीवन की एक उत्कृष्ट ऐवरेज आयु है वहां तक जाना चाहिए – अगर हम वहां तक नहीं पहुँच पाते तो हमारी एक अचानक मृत्यु है और यह हमारे आहार और विहार के कारण है , लगता है कि इसके कारण हुआ, उसके कारण हुआ – लोग कहते हैं एक्सीडेंट ? यह हमारे विहार के कारण है – कभी किसी बुद्ध पुरुष को एक्सीडेंट में मरते हुए नहीं देखोगे – बुद्ध पुरुष का सेंस इतना तगड़ा होता है कि गाड़ी कहाँ से आ रही है और कब चली है – उनको यह भी पता होता है ।
वह क्यों टकराने जायगा , वह कैसे टकरा जायगा ?
जैसे कभी कहते हो कि हमारा सिक्स्थ सेंस काम कर गया और मैंने ब्रेक लगा दिया , और नहीं तो मैं गया था – तो यह सिक्स्थ सेंस आपका कभी कभी जगता है , बुद्ध पुरुष का सदैव जगा रहता है बाकी वन, टू, थ्री,फोर, फाइव से कोई काम ही नहीं करते वे , सिक्स्थ में ही करते रहते हैं क्योंकि छठाँ उनका जगा हुआ है ।
तो एक्सीडेंट भी आप कहोगे तो मैं साबित कर दूँगा कि एक्सीडेंट भी आपके विहार के कारण है ।
जहां जाना चाहिए वहां जाते नहीं, जहां घूमना चाहिए वहां घूमते नहीं , जहां नहीं बैठना चाहिए वहीं विहार करते हो , नहीं जिनका संग करना चाहिए उन्ही का संग करते हो तो बुद्धि में अगर व्यतिक्रम आ जाय , बुद्धि दुर्बुद्धि बन जाय तो उसके बाद एक यह समझने की प्रक्रिया शिथिल पड़ जाती है , जब सेंसटिविटी कम हो जाएगी तो कहीं भी एक्सीडेंट कर जाओगे । …….

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