आचरण नहीं – जागरण

Guruvani

शास्त्र , संत कहते हैं कि शब्द ज्ञान नहीं हो सकते , शब्द माध्यम हैं – श्रवण ज्ञान नहीं हो सकता, श्रवण माध्यम है – गुरु को सुनना ज्ञान नहीं हो सकता , माध्यम है सत्संग में बैठना – सिद्धि प्राप्ति की शर्त नहीं है बल्कि एक माध्यम है , एक अवसर है कि शायद सिद्ध हो जाओ यहाँ आकर और यह गारेंटी कोई संत – कोई सद्गुरु न दे सकेगा तुम्हें कि तुम बस मेरी बातें सुनते रहो और प्रकृति और परमात्मा तुम्हें सब कुछ प्रदान कर देंगे क्योंकि ये सब बातें , ये सत्संग जो निरंतर तुम यहां ले रहे हो , जगत ले रहा है वह इसलिए है कि तुम्हारे जागरण हो जाँय , जागृति हो जाय तुम्हारी ।
और एक बात समझना – हम आचरण के पीछे पड़े हुए हैं , सारी दुनियाँ आचरण के पीछे पडी है – आचरण सुधारो , आचरण सुधारो , आचरण सुधारो – पर सद्गुरु कभी आचरण व नैतिक शिक्षा के बारे में बात नहीं करते और वह गुरु हो भी नहीं सकता जो केवल नीतियों की बातें हैं – नैतिक शिक्षा तुम्हें दिलाए ।
सद्गुरु कभी आचरण की बात नहीं करते , सद्गुरु तुमसे जागरण की बात करते है । अगर जागरण आ गया तो आचरण तो उसके पीछे है और जरूरी नहीं कि तुम्हारे आचरण अच्छे हों तो तुम जागृत ही हो ।
कई बार सुषुप्ति अवस्था में हमारे आचरण अच्छे हैं – शिव के ऊपर हजारों लीटर दूध चढ़ाना यह कोई गंदा आचरण तो नहीं कहता , शरीर की अवस्था ठीक नहीं जो धर्म करने का साधन है उसके बाद भी भयभीत होकर उपवास करना – इसे गलत आचरण तो कोई न कहेगा क्योंकि तुम कोई चोरी नहीं कर रहे , छेड़खानी नहीं कर रहे , नैतिक शिक्षा के विरुद्ध नहीं जा रहे लेकिन तुम्हारा यह आचरण तुमें मूढ़ता की ओर ले जा रहा है , दुःख की ओर धकेल रहा है पर सदाचरण है यह ।
इसलिए जब जब हमारे ऊपर नैतिक शिक्षा का दबाव बढ़ा दमनात्मक प्रवृत्तियाँ हमें सिखाई गईं – इसको दबाओ , यह दामन करो , वहाँ शमन करो तो वह एक वाह्य आचरण बन गया – हमारा पर जागरण न हुआ ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Rating*